
अनूपपुर।
सरकारी तंत्र में जब रक्षक ही भक्षकों के मददगार बन जाएं, तो नियम-कानून केवल कागजों की शोभा बनकर रह जाते हैं। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ठोडीपानी के प्राचार्य द्वारा आरटीआई अधिनियम की धज्जियां उड़ाना और उच्च अधिकारियों के आदेशों को ठेंगे पर रखना महज एक अधिकारी की जिद नहीं, बल्कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग अनूपपुर के भीतर बैठे कुछ ‘करीबी’ अधिकारियों और कर्मचारियों के संरक्षण का नतीजा है। यह सवाल अब शहर की फिजाओं में गूंज रहा है कि आखिर विभाग के वो कौन से ‘वरदहस्त’ हैं, जो इस लापरवाह प्राचार्य को कार्रवाई के शिकंजे से बचा रहे हैं?
विभागीय कार्यालय में बैठे ‘संरक्षकों’ ने बनाया प्राचार्य को कानून से ऊपर, आखिर कब तक चलेगा मिलीभगत का खेल?

प्राचार्य की हिम्मत की दाद देनी होगी कि वे सहायक आयुक्त कार्यालय की पेशी को रद्दी का टुकड़ा समझते हैं। लेकिन यह हिम्मत उन्हें विभाग के उन बाबुओं और अधिकारियों से मिलती है, जो फाइल को दबाने और नोटिस को कमजोर करने की कला में माहिर हैं। सूत्रों की मानें तो प्राचार्य और सहायक आयुक्त कार्यालय के कुछ रसूखदार कर्मचारियों के बीच ‘लेन-देन’ का ऐसा गहरा रिश्ता है, जिसने प्रशासनिक चाबुक को कुंद कर दिया है। जब तक विभाग के इन अंदरूनी मददगारों पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक ठोडीपानी प्राचार्य जैसे लोग जनता की गाढ़ी कमाई और बच्चों के भविष्य पर डाका डालते रहेंगे।
धारा 20 के जुर्माने से लेकर सेवा समाप्ति तक: क्या प्रशासन दिखाएगा अपनी ताकत या भ्रष्टाचार के आगे टेक देगा घुटने?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20(1) के तहत जानकारी न देने वाले लोक सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये से लेकर अधिकतम 25,000 रुपये तक के अर्थदंड का प्रावधान है। इतना ही नहीं, धारा 20(2) के तहत उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की जाती है। यदि भ्रष्टाचार की पुष्टि होती है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं और सिविल सेवा आचरण नियमों के उल्लंघन के तहत प्राचार्य को निलंबित कर सेवा से बर्खास्त भी किया जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अनूपपुर का जनजातीय विभाग अपने ही ‘खास’ लोगों के खिलाफ इतनी बड़ी धाराओं का प्रयोग करने का साहस जुटा पाएगा?
नोटिस का मजाक और सरकारी तंत्र को चुनौती: भ्रष्ट तंत्र के गठजोड़ ने छीना जनता का जवाबदेही का हक

ठोडीपानी प्राचार्य का फोन न उठाना और कार्यालय से नदारद रहना यह साबित करता है कि उन्हें अपने आकाओं पर पूरा भरोसा है। जनजातीय कार्य विभाग के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों ने प्राचार्य के इर्द-गिर्द एक ऐसा सुरक्षा कवच बना दिया है, जिसे भेद पाना आम नागरिक के बस की बात नहीं रही। बजट के बंदरबांट की गंध अब कार्यालय की फाइलों से बाहर निकलकर सड़कों तक पहुंच गई है। अगर जल्द ही इस ‘नेक्सस’ को नहीं तोड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले की पूरी शिक्षा व्यवस्था इन सफेदपोश भ्रष्टाचारियों की भेंट चढ़ जाएगी।
चेतावनी:
“लोकतंत्र में जनता का पैसा किसी की जागीर नहीं है। यदि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग अनूपपुर के कार्यालय में बैठे संरक्षणदाता अपनी हरकतों से बाज नहीं आए, तो जनता का आक्रोश सीधे विभाग की चौखट तक पहुंचेगा।”








