
अनुपपुर/.
नगर परिषद बनगवां और डूमर कछार क्षेत्र में इन दिनों अवैध सट्टा कारोबार पूरी तरह से बेलगाम नजर आ रहा है। ₹1 पर ₹80 तक का सपना दिखाकर लोगों को इस जुए के दलदल में उतारा जा रहा है, जहां कुछ लोगों की किस्मत पलभर के लिए चमकती है, लेकिन सैकड़ों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बर्बाद हो जाती है। सूत्रों के अनुसार इस अवैध खेल का रोजाना का टर्नओवर लाखों रुपये तक पहुंच चुका है। कागजों पर खेले जाने वाला सट्टा अब व्हाट्सएप और ऑनलाइन माध्यम से संचालित हो रहा है, जिससे यह नेटवर्क और भी तेज और व्यापक हो गया है। प्रशासनिक रोक के बावजूद यह कारोबार वर्षों से खुलेआम फल-फूल रहा है, जो कई सवाल खड़े करता है।
कागज से मोबाइल तक पहुंचा सट्टे का जाल
पहले सट्टा गुपचुप तरीके से पर्चियों पर खेला जाता था, लेकिन समय के साथ यह पूरी तरह डिजिटल हो गया है। अब बुकी व्हाट्सएप के जरिए नंबर भेजते हैं और खिलाड़ियों से ऑनलाइन या नकद पैसे मंगवाते हैं। उन्हें भरोसा दिलाया जाता है कि ओपन और क्लोज में ₹1 का ₹8 मिलेगा, रनिंग आने पर ₹1 का ₹80 तक भुगतान होगा और जो बड़े दांव लगाते हैं, उन्हें ₹1 पर ₹85 तक का लालच दिया जाता है।
इस डिजिटल व्यवस्था ने सट्टे को और भी आसान बना दिया है। अब घर बैठे मोबाइल से ही लोग इस जुए में फंस रहे हैं। खासतौर पर मजदूरी करने वाले कर्मचारी, छोटे दुकानदार और युवा वर्ग तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। कई लोग अपनी रोज की कमाई इसी उम्मीद में लगा देते हैं कि शायद आज किस्मत पलट जाए, लेकिन अधिकतर को खाली हाथ लौटना पड़ता है।

रोजाना लाखों का कारोबार, समाज की भारी कीमत
सूत्र बताते हैं कि राजनगर और पौराधार क्षेत्र के दो प्रमुख सट्टा किंग कैश और ऑनलाइन माध्यम से रोजाना लाखों रुपये इकट्ठा कर रहे हैं। इन पैसों का एक हिस्सा ऊपर के बड़े सटोरियों तक भी पहुंचाया जाता है। गांव-गांव इनके लिंक बैठे हुए हैं, जो पूरे इलाके से गेम इकट्ठा कर इन तक पहुंचाते हैं।
इस अवैध खेल की असली कीमत आम लोग चुका रहे हैं। कई परिवार कर्ज में डूब चुके हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और घरों में तनाव बढ़ता जा रहा है। कहीं मजदूरी की पूरी कमाई सट्टे में चली जाती है तो कहीं लोग उधार लेकर दांव लगाते हैं। सट्टा अब सिर्फ पैसों का नुकसान नहीं बल्कि सामाजिक बर्बादी का कारण बनता जा रहा है।
अपराधी पुराने, कार्रवाई नई क्यों नहीं?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन सट्टा किंगों के खिलाफ रामनगर थाने में पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके बावजूद वे बेखौफ होकर अपना कारोबार चला रहे हैं। कभी-कभार उनके गुर्गों पर पुलिस कार्रवाई होती है, कुछ दिनों तक शांति रहती है और फिर नए चेहरे बैठाकर वही खेल दोबारा शुरू हो जाता है।
लोगों के बीच चर्चा आम है कि आखिर किसके संरक्षण में यह संगठित अपराध वर्षों से फल-फूल रहा है। जब सरगना पहले से चिन्हित हैं तो उन पर स्थायी और कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या कानून सिर्फ छोटे मोहरों तक सीमित रह जाता है और असली खिलाड़ी हर बार बच निकलते हैं?
नगर परिषद बनगवां और नगर परिषद डूमरकछार में फैलता सट्टे का यह नेटवर्क अब कानून व्यवस्था के साथ-साथ समाज के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है। सवाल साफ है — क्या प्रशासन इस अवैध कारोबार पर सख्ती से लगाम लगाएगा या फिर ₹1 के लालच में लाखों की तबाही का यह खेल यूं ही चलता रहेगा?








