
बोले तो बवाल: Global Debt news
दुनिया इस वक्त एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ी है, जहां लगभग हर देश किसी न किसी रूप में कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। चाहे विकसित अर्थव्यवस्थाएं हों या विकासशील देश, सरकारी उधारी (Government Debt) लगातार बढ़ती जा रही है।
Global Debt यानी वैश्विक कर्ज जनवरी 2026 तक अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है, जिससे सरकारों, केंद्रीय बैंकों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की चिंता बढ़ गई है।
ऐसे में आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि दुनिया का सबसे कर्जदार देश कौन-सा है? भारत इस रैंकिंग में कहां खड़ा है? और क्या भारत की आर्थिक स्थिति वाकई चिंता की वजह है या फिर मजबूत आधार पर टिकी हुई है?
आइए, इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं।
Global Debt Crisis: पूरी दुनिया कर्ज के जाल में क्यों फंसती जा रही है?
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक कर्ज के तेजी से बढ़ने के पीछे कई बड़े कारण रहे हैं।
कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, मिडिल ईस्ट में तनाव, महंगाई पर काबू पाने के लिए बढ़ी ब्याज दरें, कल्याणकारी योजनाएं और लगातार बढ़ता राजकोषीय घाटा—इन सबने मिलकर सरकारों को भारी मात्रा में कर्ज लेने पर मजबूर किया।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 और जनवरी 2026 तक के उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार:
.दुनियाभर की सरकारें रिकॉर्ड स्तर पर उधार ले चुकी हैं
.कई देशों में कर्ज जीडीपी से कई गुना ज्यादा हो गया है
.विकसित देशों में भी वित्तीय संतुलन बिगड़ता दिख रहा है
दुनिया का सबसे कर्जदार देश कौन? अमेरिका क्यों सबसे ऊपर
USA Debt: 38.3 ट्रिलियन डॉलर का पहाड़ जैसा कर्ज
संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) इस समय दुनिया का सबसे कर्जदार देश है।
अमेरिका पर कुल सरकारी कर्ज का अनुमान करीब 38.3 ट्रिलियन डॉलर लगाया गया है, जो वैश्विक सार्वजनिक कर्ज का लगभग एक तिहाई हिस्सा है।
अमेरिका के भारी कर्ज के पीछे ये बड़े कारण माने जाते हैं:
.रिजर्व करेंसी (US Dollar) होने का फायदा
.अत्यधिक सैन्य खर्च
.सामाजिक सुरक्षा और वेलफेयर योजनाएं
.लगातार बजट घाटा
.टैक्स कटौती और बढ़ते सरकारी खर्च
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था और डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता के कारण अभी इस कर्ज को संभाल पा रहा है, लेकिन लंबे समय में यह चुनौती बन सकता है।
चीन, जापान और यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी भारी कर्ज में
China Debt: इंफ्रास्ट्रक्चर और लोकल गवर्नमेंट लोन की मार
अमेरिका के बाद चीन दुनिया का दूसरा सबसे कर्जदार देश है।
चीन पर कुल सरकारी कर्ज करीब 18.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है।
चीन के कर्ज बढ़ने की प्रमुख वजहें हैं:
चीन के कर्ज बढ़ने की प्रमुख वजहें हैं:
.बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
.स्थानीय सरकारों की उधारी
.रियल एस्टेट सेक्टर संकट
.आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए प्रोत्साहन पैकेज
Japan Debt: GDP से कई गुना ज्यादा कर्ज
जापान तीसरे स्थान पर है, जिस पर करीब 9.8 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी कर्ज है।
जापान की खास बात यह है कि उसका Debt to GDP Ratio करीब 237% है, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा माना जाता है।
हालांकि, जापान का अधिकांश कर्ज घरेलू निवेशकों से लिया गया है, जिससे उसे बाहरी जोखिम कम रहता है।
यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं भी पीछे नहीं
.यूनाइटेड किंगडम (UK): लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर
.फ्रांस: करीब 3.9 ट्रिलियन डॉलर
.इटली: लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर
यूरोपीय देशों में बढ़ती उम्र की आबादी, सामाजिक खर्च और धीमी आर्थिक वृद्धि कर्ज बढ़ने की मुख्य वजह मानी जा रही है।
India Debt Ranking: भारत किस नंबर पर है?
भारत दुनिया का सातवां सबसे कर्जदार देश
कुल सरकारी कर्ज के लिहाज से भारत सातवें स्थान पर आता है।
भारत का कुल सरकारी कर्ज और देनदारी लगभग 3.8 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है।
पहली नजर में यह आंकड़ा बड़ा लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ कुल कर्ज से किसी देश की आर्थिक सेहत का सही आकलन नहीं किया जा सकता।
Debt to GDP Ratio: असली पैमाना यहीं से समझ आता है
किसी भी देश की आर्थिक स्थिति समझने के लिए Debt to GDP Ratio सबसे अहम माना जाता है।
कर्ज-से-जीडीपी अनुपात में भारत की स्थिति
.भारत का Debt to GDP Ratio: लगभग 81.9%
.वैश्विक रैंकिंग: 31वें से 35वें स्थान के बीच
यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत की स्थिति कई विकसित देशों की तुलना में बेहतर है।
दुनिया की सबसे तनावग्रस्त अर्थव्यवस्था कौन?
.सूडान: कर्ज जीडीपी का 221% से 252%
.जापान: करीब 237%
.कई छोटे देश ऐसे भी हैं जिनका कर्ज उनकी पूरी अर्थव्यवस्था से कई गुना ज्यादा है
भारत की ताकत: क्यों नहीं डूब रहा है भारत कर्ज में?
भारत के कर्ज प्रोफाइल की कुछ बड़ी मजबूती हैं, जो उसे बाकी देशों से अलग बनाती हैं।
- 95% से ज्यादा कर्ज घरेलू
भारत का 95% से ज्यादा सरकारी कर्ज घरेलू स्रोतों से लिया गया है।
इसका मतलब:
.करेंसी क्राइसिस का खतरा कम
.विदेशी मुद्रा पर दबाव नहीं
2. बाहरी कर्ज 5% से भी कम
कुल सरकारी देनदारी में भारत का External Debt सिर्फ 5% से कम है, जो एक बड़ी राहत की बात मानी जाती है।
3. मजबूत आर्थिक वृद्धि
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
GDP ग्रोथ मजबूत रहने से सरकार को भविष्य में कर्ज चुकाने की क्षमता बनी रहती है।
सरकार का लक्ष्य: 2031 तक बड़ा बदलाव
भारत सरकार ने साफ किया है कि:
.2031 तक Debt to GDP Ratio को घटाकर करीब 50% करने का लक्ष्य
.राजकोषीय घाटा नियंत्रण में लाने की योजना
.पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) पर फोकस
.टैक्स बेस बढ़ाने और डिजिटलीकरण से राजस्व बढ़ाने की रणनीति
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में भी संकेत दिया गया है कि भारत धीरे-धीरे कर्ज के बोझ को संतुलित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
निष्कर्ष: क्या भारत को डरने की जरूरत है?
अगर सिर्फ आंकड़ों को देखा जाए तो भारत पर कर्ज जरूर है, लेकिन:
.कर्ज का बड़ा हिस्सा घरेलू है
.कर्ज-से-जीडीपी अनुपात नियंत्रण में है
.आर्थिक वृद्धि मजबूत है
.सरकार के पास स्पष्ट रोडमैप है
यानी, भारत कर्ज में डूबा हुआ देश नहीं, बल्कि एक मैनेज्ड इकोनॉमी है, जो सावधानी से आगे बढ़ रही है।








