हमने बोला तो बवाल तय है

हमने बोला तो बवाल तय है

संसद में 44 मिनट का सियासी संग्राम: राहुल गांधी की किताब से लेकर राजनाथ-शाह के पलटवार तक, लोकसभा में क्यों मचा बवाल?

बोले तो बवाल: Parliament News Today

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान सोमवार को ऐसा सियासी घमासान देखने को मिला, जिसने संसद की कार्यवाही को ठप कर दिया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण के दौरान करीब 44 मिनट तक सदन में लगातार हंगामा चलता रहा। मामला डोकलाम विवाद, पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की किताब, एक मैग्जीन आर्टिकल, और भारत-चीन संबंधों के जिक्र से जुड़ा था।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और सत्ता पक्ष के कई सांसदों ने राहुल गांधी के कथनों पर कड़ा ऐतराज जताया। वहीं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बार-बार नियमों और परंपराओं का हवाला देते रहे। आखिरकार बढ़ते शोर-शराबे के बीच सदन की कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।

राहुल गांधी का भाषण शुरू होते ही क्यों भड़का सदन?

सोमवार को जैसे ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए खड़े हुए, सदन में हंगामे के सुर सुनाई देने लगे। राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या द्वारा कांग्रेस और भारतीय संस्कृति को लेकर लगाए गए आरोपों का जवाब देने से की।

इसी क्रम में राहुल गांधी ने डोकलाम विवाद का जिक्र करते हुए पूर्व थल सेना प्रमुख मनोज नरवणे की एक किताब का हवाला दिया। यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तत्काल खड़े होकर आपत्ति जताई और कहा कि जिस किताब को कोट किया जा रहा है, वह अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है, ऐसे में उसे सदन में पढ़ा जाना नियमों के खिलाफ है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी राहुल गांधी को टोका और कहा कि सदन में केवल ऑथेंटिक और आधिकारिक दस्तावेजों का ही हवाला दिया जा सकता है।

‘किताब ऑथेंटिक है’ बनाम ‘सदन को गुमराह किया जा रहा है’

राहुल गांधी ने किताब के अंश हाथ में दिखाते हुए कहा कि यह 100 प्रतिशत ऑथेंटिक है और इसमें देशहित से जुड़ी बातें हैं। लेकिन सत्ता पक्ष इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ।

राजनाथ सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा कि

“नेता प्रतिपक्ष सदन को गुमराह कर रहे हैं। जो किताब प्रकाशित ही नहीं हुई, उसका हवाला कैसे दिया जा सकता है?”

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इस पर पॉइंट ऑफ ऑर्डर उठाया। स्पीकर ओम बिरला ने स्पष्ट किया कि अखबार की कटिंग, अप्रकाशित किताब या गैर-आधिकारिक दस्तावेजों पर चर्चा करने की परंपरा लोकसभा में नहीं रही है।

कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने राहुल गांधी का बचाव करते हुए कहा कि सरकार जानबूझकर किताब को प्रकाशित नहीं होने दे रही है। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि

“विवाद तो राहुल गांधी खुद स्वीकार कर चुके हैं कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है।”

मैग्जीन आर्टिकल पढ़ने पर भी बवाल

किताब पर विवाद के बाद राहुल गांधी ने एक मैग्जीन आर्टिकल का हवाला देने की कोशिश की। लेकिन यहां भी सत्ता पक्ष ने जोरदार विरोध किया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि ऐसी किसी भी सामग्री को पढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि

“हम सुनने के लिए बैठे हैं, लेकिन रूलिंग के बाद भी वही बातें दोहराई जा रही हैं। ऐसे सदन कैसे चलेगा?”

इस बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि चीन से जुड़ा मुद्दा संवेदनशील जरूर है, लेकिन अगर कोई सुझाव देशहित में है तो उसे सुना जाना चाहिए। उन्होंने डॉ. लोहिया और मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हुए चीन के प्रति सतर्क रहने की बात कही।

तेजस्वी सूर्या, राष्ट्रपति का अभिभाषण और नियमों की बहस

केसी वेणुगोपाल ने रूल 349 का हवाला देते हुए कहा कि तेजस्वी सूर्या ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाए हैं, इसलिए जवाब देना जरूरी है। इस पर अमित शाह ने कहा कि

“तेजस्वी सूर्या ने 2004 से 2014 तक के राष्ट्रपति के अभिभाषण के शब्दों को कोट किया है। अगर जवाब देना है, तो उसी अभिभाषण से दीजिए।”

स्पीकर ओम बिरला ने वेणुगोपाल को बैठने का निर्देश देते हुए कहा कि

“विपक्ष के नेता बोलेंगे। सदन में एलओपी एडवोकेट नहीं खड़े करते।”

‘आप ही बता दीजिए मैं क्या बोलूं’ – राहुल गांधी की तल्ख टिप्पणी

लगातार टोके जाने से नाराज़ राहुल गांधी ने कहा कि

“ये लोग कहते हैं कि हम आतंकवाद से लड़ते हैं, लेकिन एक तथ्य से डरते हैं। इसमें ऐसा क्या है, जिसे पढ़ा नहीं जा सकता?”

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि डोकलाम में क्या हुआ, इसकी पूरी जिम्मेदारी वह खुद लेते हैं। इस पर राजनाथ सिंह ने कहा कि

“अगर नरवणे को लगता था कि किताब पर रोक गलत है, तो वे कोर्ट क्यों नहीं गए?”

तनाव के बीच राहुल गांधी ने स्पीकर से कहा –

“मैं आपका सलाहकार नहीं हूं, लेकिन आपको सदन की मर्यादा रखनी होगी।”

चीन-पाकिस्तान और प्रधानमंत्री के जिक्र पर बढ़ा तनाव

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें किताब, मैग्जीन और अब भारत-चीन संबंधों पर बोलने से भी रोका जा रहा है। स्पीकर ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में चीन का कोई उल्लेख नहीं है।

राहुल गांधी ने पलटकर कहा कि

“तो क्या राष्ट्रपति के संबोधन का अंतरराष्ट्रीय संबंधों से कोई लेना-देना नहीं है? हम चीन-पाकिस्तान पर नहीं बोल सकते?”

जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री का जिक्र करते हुए आगे बोलना चाहा, तभी स्पीकर ने अगला वक्ता घोषित करते हुए अखिलेश यादव का नाम ले लिया।

हंगामे के बीच लोकसभा स्थगित

राहुल गांधी के भाषण के दौरान बढ़ते हंगामे, नारेबाजी और आपत्तियों के बीच सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से नहीं चल सकी। आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष ने हालात को देखते हुए कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक स्थगित करने का फैसला लिया।

सियासी मायने: विपक्ष बनाम सरकार की टकराव की नई तस्वीर

लोकसभा में हुआ यह 44 मिनट का बवाल साफ तौर पर बताता है कि सरकार और विपक्ष के बीच टकराव किस हद तक पहुंच चुका है। डोकलाम, चीन, सेना और प्रधानमंत्री जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा को लेकर नियम, परंपरा और राजनीतिक रणनीति आमने-सामने नजर आई।

एक ओर विपक्ष सरकार पर तथ्यों से डरने का आरोप लगा रहा है, तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष संसदीय मर्यादा और नियमों का हवाला देकर हमलावर है। आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज होने के संकेत दे रहा है।

निष्कर्ष: संसद का यह बवाल क्या संकेत देता है?

लोकसभा में 44 मिनट तक चला यह हंगामा सिर्फ एक किताब या मैग्जीन आर्टिकल को लेकर नहीं था, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच गहराते अविश्वास और बढ़ती सियासी खाई का प्रतीक बनकर सामने आया। राहुल गांधी का कहना था कि वे देशहित और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तथ्यों को सामने रखना चाहते थे, जबकि सरकार ने इसे संसदीय नियमों और परंपराओं का उल्लंघन बताया।

यह टकराव साफ दिखाता है कि संसद में अब बहस का दायरा तथ्यों बनाम नियमों तक सिमटता जा रहा है। एक तरफ विपक्ष का आरोप है कि सरकार असहज सवालों से बच रही है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन को अखबार, अप्रमाणित दस्तावेज़ और राजनीतिक नाटकीयता के ज़रिये नहीं चलाया जा सकता।

अंततः सदन का स्थगित होना इस बात का संकेत है कि संवाद की जगह टकराव ले रहा है। अगर यही हाल रहा, तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच—संसद—बहस के बजाय बवाल का अखाड़ा बनता चला जाएगा। सवाल यह है कि आने वाले सत्रों में क्या सत्ता और विपक्ष संयम, संवाद और मर्यादा की ओर लौट पाएंगे, या संसद का हर बड़ा मुद्दा इसी तरह हंगामे की भेंट चढ़ता रहेगा?

Bole To Bawal
Author: Bole To Bawal

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